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Mahavirashtak Stotra -महावीराष्टक स्तोत्र

Mahavirashtak Stotra -महावीराष्टक स्तोत्र . कविवर भागचंद जी रचित। इनकी अन्य रचना व काल :महावीराष्टक, अमितगति श्रावकाचार वचनिका, प्रमाण परीक्षा वचनिका, उपदेश सिद्धांत रत्नमाला वचनिका, पदसंग्रह आदि के कर्ता एक हिंदी कवि। समय–वि.श. 19-20 (ई.श. 19 उत्तरार्ध) . इस स्तोत्र का प्रतिदिन जो मनुष्य पाठ करता है। उसके जीवन में सुख शांति का अनुपम वास होता है। 

Mahavirashtak Stotra -महावीराष्टक स्तोत्र in Sanskrit Lyrics

( शिखरिणी छंद )

1.

 यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिदचितःसमं भान्ति ध्रौव्य व्यय-जनि-लसन्तोऽन्तरहिताः।
जगत्साक्षी मार्ग-प्रकटन परो भानुरिवयो महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु में॥1॥

2.

अताम्रं यच्चक्षुः कमल-युगलं स्पन्द-रहितं
जनान्कोपापायं प्रकटयति वाभ्यन्तरमपि।
स्फुटं मूर्तिर्यस्य प्रशमितमयी वातिविमला
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥2॥
3.
नमन्नाकेंद्राली-मुकुट-मणि-भा जाल जटिलं
लसत्पादाम्भोज-द्वयमिह यदीयं तनुभृताम्‌।
भवज्ज्वाला-शान्त्यै प्रभवति जलं वा स्मृतमपि
महावीर स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥3॥
4.
यदर्च्चा-भावेन प्रमुदित-मना दर्दुर इह
क्षणादासीत्स्वर्गी गुण-गण-समृद्धः सुख-निधिः।
लभन्ते सद्भक्ताः शिव-सुख-समाजं किमुतदा
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥4॥
5.
कनत्स्वर्णाभासोऽप्यपगत-तनुर्ज्ञान-निवहो
विचित्रात्माप्येको नृपति-वर-सिद्धार्थ-तनयः।
अजन्मापि श्रीमान्‌ विगत-भव-रागोद्भुत-गतिर्‌
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥5॥

6.

यदीया वाग्गंगा विविध-नय-कल्लोल-विमला
बृहज्ज्ञानाभ्भोभिर्जगति जनतां या स्नपयति।
इदानीमप्येषा बुध-जन-मरालै परिचिता
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥6॥
7.
अनिर्वारोद्रेकस्त्रिभुवन-जयी काम-सुभटः
कुमारावस्थायामपि निज-बलाद्येन विजितः
स्फुरन्नित्यानन्द-प्रशम-पद-राज्याय स जिनः
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥7॥
8.
महामोहातक-प्रशमन-पराकस्मिक-भिषक्‌
निरापेक्षो बंधु र्विदित-महिमा मंगलकरः।
शरण्यः साधूनां भव-भयभृतामुत्तमगुणो
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥8॥
9.
महावीराष्टकं स्तोत्रं भक्त्या ‘भागेन्दु’ ना कतम्‌।
यः यठेच्छ्रणुयाच्चापि स याति परमां गतिम्‌॥9॥

 


महावीराष्टक स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित

जिस प्रकार सन्मुख समागम पदार्थ दर्पण में झलकते है, उसी प्रकार | जिनके केवलज्ञान में समस्त जीव-अजीव अनंत पदार्थ उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य | सहित युगपत् प्रतिभासित होते रहते है; तथा जिस प्रकार सूर्य लौकिक मार्गों को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार मोक्षमार्ग को प्रकाशित करनेवाले जो जगत के ज्ञाता–दृष्टा हैं; वे भगवान महावीर मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात् मुझे ( हमें ) दर्शन दे।।१।।

स्पन्द (टिमकार ) और लालिमा रहित जिनके दोनों नेत्रकमल मनुष्यों को | बाह्य और अभ्यंतर क्रोधादि विकारों का प्रभाव प्रगट कर रहे हैं; और जिनकी मुद्रा स्पष्ट रूप से पूर्ण शान्त और अत्यंत विमल है; वे भगवान महावीर स्वामी मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात् मुझे ( हमें ) दर्शन दे।।२।।

नम्रीभूत इन्द्रों के समूह के मुकुटों की मणियों के प्रभाजाल से जटिल | ( मिश्रित ) जिनके कान्तिमान दोनों चरणकमल, स्मरण करने मात्र से ही, शरीरधारियों की सांसारिक दुःख–ज्वालाओं का, जल के समान शमन कर देते | हैं; वे भगवान महावीर स्वामी मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात् मुझे | ( हमें ) दर्शन दे ।।३।।

जब पूजा करने के भाव मात्र से प्रसन्नचित्त मेढ़क ने क्षण भर में गुणगणों से समृद्ध सूख की निधि स्वर्गसंपदा को प्राप्त कर लिया, तब यदि उनके सद्भक्त मुक्ति-सुख को प्राप्त करलें तो कौनसा आश्चर्य हैं अर्थात् उनके सद्भक्त अवश्य ही मुक्ति को प्राप्त करेंगे। वे भगवान महावीर स्वामी मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात् मुझे ( हमें ) दर्शन दे ।। ४ ।।

Mahavirashtak stotra meaning in hindi

जो अंतरंग दृष्टि से ज्ञानशरीरी ( केवलज्ञान के पुज ) एवं बहिरंग दृष्टि से तप्त स्वर्ण के समान आभामय शरीरवान होने पर भी शरीर से रहित हैं; अनेक ज्ञेय उनके ज्ञान मे झलकते हैं – अतः विचित्र ( अनेक ) होते हुए भी एक ( अखण्ड ) हैं; महाराजा सिद्धार्थ के पुत्र होते हुए भी अजन्मा हैं; और केवलज्ञान तथा समवशरणादि लक्ष्मी से युक्त होने पर भी संसार के राग से रहित हैं । इस प्रकार के आश्चर्यो के निधान वे भगवान महावीर स्वामी मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात मुझे ( हमें ) दर्शन दे ।।५।।

जिनकी वाणीरूपी गंगा नाना प्रकार के नयरूपी कल्लोलों के कारण निर्मल हैं और अगाध ज्ञानरूपी जल से जगत की जनता को स्नान कराती रहती है तथा इस समय भी विद्वज्जनरूपी हंसों के परिचित है, वे भगवान महावीर स्वामी मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात् मुझे ( हमें ) दर्शन दे ।।६।।

अनिर्वार हैं वेग जिसका और जिसने तीन लोकों को जीत लिया हैं, ऐसे कामरूपी सुभट को जिन्होने स्वयं आत्मबल से कुमारावस्था में ही जीत लिया हैं, परिणामस्वरूप जिनके अनन्तशक्ति का साम्राज्य एवं शाश्वतसुख स्फुरायमान हो रहा हैं; वे भगवान महावीर स्वामी मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात् मुझे (हमें ) दर्शन दे ।। ७ ।।

जो महा मोहरूपी रोग को शान्त करने के लिए निरपेक्ष वैद्य हैं, जो जीव मात्र के नि:स्वार्थ बन्धु हैं, जिनकी महिमा से सारा लोक परिचित हैं, जो महामंगल के करने वाले हैं, तथा भव-भय से भयभीत साधुओं को जो शरण हैं; वे उत्तम गुणो के धारी भगवान महावीर स्वामी मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात् मुझे ( हमें ) दर्शन दे ।। ८ ।।

जो कविवर भागचंद द्वारा भक्तिपूर्वक रचित इस महावीराष्टक स्तोत्र का पाठ करता हैं व सुनता हैं, वह परमगति ( मोक्ष ) को पाता हैं।


Mahavirashtak Stotra In English Meaning

Just as substances in front of a mirror are reflected in it, in the same way all animate and inanimate objects with their origination, disappearance and permanence are at one and the same moment reflected in whose omniscience and who is the seer and knower of the world and illumines the path of spiritual perfection, just as the sun bestows its light on all the worldly paths, I implore that Lord Mahaveer to stay in the path of my vision.


Both of whose lotus eyes, without glimmer and redness, expose to the humans the absence of external and internal passions like anger; whose appearance is utterly pure and calm, I implore thee, Oh Lord Mahaveer, to stay in the path of my vision.


Both of whose lotus feet are illuminated with the brilliance of the gems of the crowns of the Lord of the heavenly beings, who pacifies the flames of the fire of agonies of the creatures of this world by his remembrance only like water, I implore that perfection, incarnate Lord Mahaveer to stay in the path of my vision.


When a frog, happy with the eagerness to worship whose lotus feet, was blessed with all the wath, bliss and comforts of heavenly life just in a moment, there is no wonder if his devotees achieve that all pervading happiness of the supreme state of our being, that is, they will certainly achieve that. I request you, Oh Lord, of the three worlds, to stay in the path of my vision.


From the intinsic point of view, you who are just a mass of sentience and externally without physical frame, though possessing a shining pure gold like body; all the substance with their multifarious modifications are being reflected in whose sentience, as such who is one indivisible and many at one and the same time; who was unborn and yet was the son of Maharaj Siddhartha; who is devoid of all the attachments of the worldly existence, and yet is associated with perfect consciousness and the wealth and luxuries of the religious congregation that is called the Samosharan, I implore Thee, an abode of countless wonders Lord Mahaveer, to stay in the path of my vision.


The Ganges of whose divine voice is perfectly pure on account of the surging waves of who always invites the living beings of this world to bathe in the fathomless stream of whose omniscience, with which all the swan-like learned souls are even now acquainted, I implore Thee Oh Lord of the Lords, Mahaveer, to stay in the path of my visions.


Who is the selfless force alone, in his boyhood, conquered the god of passions, whose force is irresistible and who has won all the three worlds; consequently who has become the sovreign of eternal happiness and everlasting vitality, I implore Thee Oh Bhagwan Mahaveer to stay in the path of my vision.


Who is a selfless physician to conquer the terrible disease of delusion, who is a selfless brother to all the living beings, the whole world is acquainted with whose grandeur, who is an instrument for the welfare of all without any distinction, who is a refuge to the monks, who are frightened with their wanderings of the worldly existence, that mass of all the good and great attributes of line, God Mahaveer, pray stay in the path of my vision.


Whosoever recites or hears this Mahaveerashtak written with great reverence by Poet Bhagchand, attains supreme bliss.


श्री जैन स्तोत्र महावीराष्टक- (पद्यानुवाद)

अनुवादक – डॉ. वीरसागर जी

जिनके चेतन में दर्पणवत् सभी चेतनाचेतन भाव।
युगपद् झलकें अंत-रहित हो ध्रुव-उत्पाद-व्ययात्मक भाव॥
जगत्साक्षी शिवमार्ग-प्रकाशक जो हैं मानों सूर्य-समान।
वे तीर्थंकर महावीर प्रभु मम हिय आवें नयनद्वार ॥१॥

जिनके लोचनकमल लालिमा-रहित और चंचला-हीन।
समझाते हैं भव्यजनों को बाह्याभ्यन्तर क्रोध-विहीन।
जिनकी प्रतिमा प्रकट शांतिमय और अहो है विमल अपार।
वे तीर्थंकर महावीर प्रभु मम हिय आवें नयन द्वार॥२॥

नमते देवों की पंक्ति की मुकुट-मणि का प्रभासमूह।
जिनके दोनों चरण-कमल पर झलके देखो जीव-समूह।
सांसारिक ज्वाला को हरने जिनका स्मरण बने जलधार।
वे तीर्थंकर महावीर प्रभु मम हिय आवें नयनद्वार ॥३॥

जिनके अर्चन के विचार से मेंढक भी जब हर्षित वान।
क्षणभर में बन गया देवता गुणसमूह और सुख निधान॥
तब अचरज क्या यदि पाते हैं सच्चे भक्त मोक्ष का द्वार।
वे तीर्थंकर महावीर प्रभु मम हिय आवें नयनद्वार ।।४।।

तप्त स्वर्ण-सा तन है, फिर भी तनविरहित जो ज्ञानशरोरी।
एक रहें होकर विचित्र भी, सिद्धार्थ राजा के वीर॥
होकर भी जो जन्मरहित हैं, श्रीमन् फिर भी न राग विकार।
वे तीर्थंकर महावीर प्रभु मम हिय आवें नयनद्वार ॥५॥

जिनकी वाणी रूपी गंगा नयलहरों से हीन-विकार।
विपुल ज्ञान-जल से जनता का करती हैं जग में स्नान ।
अहो आज भी इससे परिचित ज्ञान रूपी हंस अपार।
वे तीर्थंकर महावीर प्रभु मम हिय आवें नयनद्वार ॥६॥

तीव्रवेग त्रिभुवन का जेता काम-योद्धा बड़ा प्रबल।
वयकुमार में जिनने जीता उसको केवल निज के बल।
शाश्वत सुख शांति के राजा बनकर जो हो गये महान।
वे तीर्थंकर महावीर प्रभु मम हिय आवें नयनद्वार ॥७॥

महामोह-आतंक शमन को जो हैं आकस्मिक उपचार।
निरापेक्ष बन्धु हैं जग में जिनकी महिमा मङ्गलकार ॥
भवभय से डरते संतों को शरण तथा वर गुण भण्डार।
वे तीर्थंकर महावीर प्रभु मम हिय आवे नयनद्वार ॥८॥

(दोहा)

महावीराष्टक स्तोत्र को, ‘भाग’ भक्ति से कीन।

जो पढ़ ले एवं सुने, परमगति हो लीन ॥

॥ Mahavirashtak Stotra -महावीराष्टक स्तोत्र सम्पूर्णम ॥


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