Kalyan Mandir Stotra Sanskrit । कल्याण मंदिर स्तोत्र संस्कृत।

कल्याण मंदिर स्तोत्र (Kalyan Mandir Stotra Sanskrit)  के रचयिता आचार्य भगवन श्री कुमुदचंद्र स्वामी (जिनका अपर नाम ‘सिद्धसेन दिवाकर’) है।  इनका काल विक्रम की चौथी – पाँचवी शताब्दी माना गया है।  इस स्तोत्र का मूल नाम “श्री पार्श्वनाथ स्तोत्रम ” है। परन्तु स्तोत्र का प्रथम प्रारम्भ शब्द कल्याण मंदिर होने से यह “कल्याण मंदिर “ के नाम से विश्व विख्यात हुआ। इस स्तोत्र की रचना स्थली राजा विक्रमादित्य के समय में अवन्ति (उज्जैन)  में स्तोत्र के प्रभाव से वाद-विवाद में एक अन्य धर्म की मूर्ति से एक जैन मूर्ति ‘श्री पारसनाथ स्वामी ‘ की प्रगट हुई थी।  तब से लेकर अब तक इसके प्रभाव से अनेकानेक लोगो ने अपने जीवन में सुख शांति का अनुभव किया है।

 

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Kalyan Mandir Stotra Sanskrit

Kalyan Mandir Stotra Sanskrit lyrics

स्तोत्र प्रारम्भ 

अभीप्सितकार्य सिद्धिदायक
कल्याणमन्दिरमुदारमवद्य – भेदि –
भीताभय – प्रदमनिन्दितमङ्घ्रिपद्मम्।
संसारसागर – निमज्जदशेष-जन्तु-
पोतायमानमभिनम्य जिनेश्वरस्य।।१।।

यस्य स्वयं सुरगुरुर्गरिमाम्बुराशे:,
स्तोत्रं सुविस्तृतमतिर्न विभुर्विधातुम्।
तीर्थेश्वरस्य कमठस्मयधूमकेतो-
स्तस्याहमेष किल संस्तवनं करिष्ये।।२।।

जलभय-निवारक
सामान्यतोऽपि तव वर्णयितुं स्वरूप-
मस्मादृश: कथमधीश! भवन्त्यधीशा:।।
धृष्टोऽपि कौशिकशिशुर्यदि वा दिवान्धो,
रूपं प्ररूपयति किन किल घर्मरश्मे:?।।३।।

असमयनिधन-निवारक
मोह-क्षयादनुभवन्नपि नाथ! मत्र्यो,
नूनं गुणान्गणयितुं न तव क्षमेत।
कल्पान्त-वान्त-पयस: प्रकटोऽपि यस्मा-
न्मीयेत केन जलधे-र्ननु रत्नराशि:?।।४।।

प्रच्छन्नधनप्रदर्शक
अभ्युद्यतोऽस्मि तव नाथ! जडाशयोऽपि,
कर्तुं स्तवं लसदसंख्य-गुणाकरस्य।
बालोऽपि किं न निजबाहु-युगं वितत्य,
विस्तीर्णतां कथयति स्वधियाम्बुराशे:।।५।।

सन्तानसम्पत्ति प्रसाधक
ये योगिनामपि न यान्ति गुणास्तवेश!
वत्तुंक़ कथं भवति तेषु ममावकाश:।
जाता तदेव-मसमीक्षित-कारितेयं,
जल्पन्ति वा निज-गिरा ननु पक्षिणोऽपि।।६।।

अभीप्सितजनाकर्षक
आस्तामचिन्त्य-महिमा जिन! संस्तवस्ते,
नामापि पाति भवतो भवतो जगन्ति।
तीव्राऽऽतपोपहत-पान्थ-जनान्निदाघे,
प्रीणाति पद्म-सरस: स-रसोऽनिलोऽपि।।७।।

कुपितोपदंशविनाशक
हृद्वर्तिनि त्वयि विभो! शिथिलीभवन्ति,
जन्तो: क्षणेन निबिडा अपि कर्मबन्धा।
सद्यो भुजङ्गम-मया इव मध्य-भाग-
मभ्यागते वन-शिखण्डिनि चन्दनस्य।।८।।

सर्पवृश्चिकविषविनाशक
मुच्यन्त एव मनुजा: सहसा जिनेन्द्र!
रौद्रै-रुपद्रव-शतैस्त्वयि वीक्षितेऽपि।
गो-स्वामिनि स्पुरित-तेजसि दृष्टमात्रे,
चौरैरिवाशु पशव: प्रपलायमानै:।।९।।

तस्कर भय विनाशक
त्वं तारको जिन! कथं भविनां त एव,
त्वामुद्वहन्ति हृदयेन यदुत्तरन्त:।
यद्वा दृतिस्तरति यज्जलमेष नून-
मन्तर्गतस्य मरुत: स किलानुभाव:।।१०।।

जलाग्निभयविनाशक

यस्मिन्हर-प्रभृतयोऽपि हत-प्रभावा:,
सोऽपि त्वया रति-पति: क्षपित: क्षणेन।
विध्यापिता हुतभुज: पयसाथ येन,
पीतं न विं तदपि दुर्धर-वाडवेन?।।११।।

अग्निभय विनाशक
स्वामिन्ननल्प-गरिमाणमपि प्रपन्ना-
स्त्वां जन्तव: कथमहो हृदये दधाना:।।
जन्मोदधिं लघु तरन्त्यतिलाघवेन,
चिन्त्यो न हन्त महतां यदि वा प्रभाव:।।१२।।

जलमिष्टताकारक
क्रोधस्त्वया यदि विभो! प्रथमं निरस्तो,
ध्वस्तास्तदा १वद कथं किल कर्म-चौरा:?
प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिरापि लोके,
नील-द्रुमाणि विपिनानि न किं हिमानी?।।१३।।

शत्रुस्नेह जनक
त्वां योगिनो जिन! सदा परमात्मरूप,
मन्वेषयन्ति हृदयाम्बुज-कोष-देशे।
पूतस्य निर्मल-रुचेर्यदि वा किमन्य-
दक्षस्य सम्भव-पदं ननु कर्णिकाया:।।१४।।

चोरिकागत द्रव्यदायक
ध्यानाज्जिनेश! भवतो भविन: क्षणेन,
देहं विहाय परमात्म-दशां व्रजन्ति।
तीव्रानलादुपल-भावमपास्य लोके,
चामीकरत्वमचिरादिव धातु-भेदा:।।१५।।

गहन वन-पर्वत भय विनाशक
अन्त: सदैव जिन! यस्य विभाव्यसे त्वं,
भव्यै: कथं तदपि नाशयसे शरीरम्।
एतत्स्वरूपमथ मध्य-विवर्तिनो हि,
यद्विग्रहं प्रशमयन्ति महानुभावा:।।१६।।

युद्धविग्रह विनाशक
आत्मा मनीषिभिरयं त्वदभेद-बुद्ध्या,
ध्यातो जिनेन्द्र! भवतीह भवत्प्रभाव:।
पानीयमप्यमृतमित्यनुचिन्त्यमानं,
किं नाम नो विष-विकारमपाकरोति।।१७।।

सर्पविष विनाशक
त्वामेव वीत-तमसं परवादिनोऽपि,
नूनं विभो! हरि-हरादि-धिया प्रपन्ना:।
किं काच-कामलिभिरीश! सितोऽपि शङ्खो,
नो गृह्यते विविध-वर्ण-विपर्ययेण?।।१८।।

नेत्ररोग विनाशक
धर्मोपदेश-समये सविधानुभावा-
दास्तां जनो भवति ते तरुरप्यशोक:।
अभ्युद्गते दिनपतौ समहीरुहोऽपि,
किं वा विबोधमुपयाति न जीव-लोक:।।१९।।

उच्चाटनकारक
चित्रं विभो! कथमवाङ्मुख-वृन्तमेव,
विष्वक्पतत्यवरला सुर-पुष्प-वृष्टि:।
त्वद्गोचरे सुमनसां यदि वा मुनीश!,
गच्छन्ति नूनमध एव हि बन्धनानि।।२०।।

शुष्कवनोपवनविकाशक
स्थाने गभीर-हृदयोदधि-सम्भवाया:,
पीयूषतां तव गिर: समुदीरयन्ति।
पीत्वा यत: परम-सम्मद-सङ्ग-भाजो,
भव्या व्रजन्ति तरसाप्यजरामरत्वम्।।२१।।

मधुरफलप्रदायक
स्वामिन्सुदूरमवनम्य समुत्पतन्तो,
मन्ये वदन्ति शुचय: सुर-चामरौघा:।
येऽस्मै नतिं विदधते मुनि-पुङ्गवाय,
ते नूनमूध्र्व-गतय: खलु शुद्ध-भावा:।।२२।।

कल्याण मंदिर स्तोत्र संस्कृत 

राज्यसन्मानदायक
श्यामं गभीर-गिरमुज्ज्वल-हेम-रत्न
सिंहासनस्थमिह भव्य-शिखण्डिनस्त्वाम्।
आलोकयन्ति रभसेन नदन्तमुच्चै-
श्चामीकराद्रि-शिरसीव नवाम्बुवाहम्।।२३।

शत्रुविजितराज्यप्रदायक
उद्गच्छता तव शिति-द्युति-मण्डलेन,
लुप्तच्छदच्छविरशोक-तरुर्बभूव।
सान्निध्यतोऽपि यदि वा तव वीतराग!
नीरागतां व्रजति को न सचेतनोऽपि।।२४।।

असाध्यरोग शामक
भो भो:! प्रमादमवधूय भजध्वमेन-
मागत्य निर्वृति-पुरीं प्रति सार्थवाहम्।
एतन्निवेदयति देव! जगत्त्रयाय,
मन्ये नदन्नभिनभ: सुरदुन्दुभिस्ते।।२५।।

वचनसिद्धिप्रतिष्ठापक
उद्योतितेषु भवता भुवनेषु नाथ!,
तारान्वितो विधुरयं विहताधिकार:।
मुक्ता-कलाप-कलितोल्ल-सितातपत्र-
व्याजात्त्रिधा धृत-तनुध्र्रुवमभ्युपेत:।।२६।।

वैरविरोधविनाशक
स्वेन प्रपूरित-जगत्त्रय-पिण्डितेन,
कान्ति-प्रताप-यशसामिव संचयेन।
माणिक्य-हेम-रजत-प्रविनिर्मितेन,
सालत्रयेण भगवन्नभितो विभासि।।२७।।

यश:कीर्तिप्रसारक
दव्य-स्रजो जिन! नमत्त्रिदशाधिपाना-
मुत्सृज्य रत्न-रचितानपि मौलि-बन्धान्।
पादौ श्रयन्ति भवतो यदि वा परत्र१,
त्वत्सङ्गमे सुमनसो न रमन्त एव।।२८।।

आकर्षणकारक
त्वं नाथ! जन्मजलधेर्विपराङ् मुखोऽपि,
यत्तारयस्यसुमतो निज-पृष्ठ-लग्नान्१।
युत्तं हि पार्थिव-नृपस्य सतस्तवैव,
चित्रं विभो! यदसि कर्म-विपाक-शून्य:।।२९।।

असंभवकार्यसाधक
विश्वेश्वरोऽपि जन-पालक! दुर्गतस्त्वं,
किं वाऽक्षर-प्रकृतिरप्यलिपिस्त्वमीश!
अज्ञानवत्यपि सदैव कथंचिदेव,
ज्ञानं त्वयि स्पुरति विश्व-विकास-हेतु:।।३०।।

शुभाशुभ प्रश्न दर्शक
प्राग्भार-सम्भृत-नभांसि रजांसि रोषा-
दुत्थापितानि कमठेन शठेन यानि।
छायापि तैस्तव न नाथ! हता हताशो,
ग्रस्तस्त्वमीभिरयमेव परं दुरात्मा।।३१।।

दुष्टताप्रतिरोधी
यद्गर्जदूर्जित-घनौघमदभ्र-भीम
भ्रश्यत्तडिन्-मुसल-मांसल-घोरधारम्।
दैत्येन मुक्तमथ दुस्तर-वारि दध्रे,
तेनैव तस्य जिन! दुस्तर-वारिकृत्यम्।।३२।।

उल्कापातातिवृष्ट्यनावृष्टिनिरोधक
ध्वस्तोध्र्व-केश-विकृताकृति-मत्र्य-मुण्ड-
प्रालम्बभृद्भयदवक्त्र-विनिर्यदग्नि:।
पे्रतव्रज: प्रति भवन्तमपीरितो य:,
सोऽस्याभवत्प्रतिभवं भव-दु:ख-हेतु:।।३३।।

भूतपिशाचपीड़ा तथा शत्रुभय नाशक

धन्यास्त एव भुवनाधिप! ये त्रिसंध्य-
माराधयन्ति विधिवद्विधुतान्य-कृत्या:।
भक्त्योल्लसत्पुलक-पक्ष्मल-देह-देशा:,
पादद्वयं तव विभो! भुवि जन्मभाज:।।३४।।

मृगी उन्माद अपस्मार विनाशक
अस्मिन्नपार-भव-वारि-निधौ मुनीश!
मन्ये न मे श्रवण-गोचरतां गतोऽसि।
आकर्णिते तु तव गोत्र-पवित्र-मन्त्रे,
किं वा विपद्विषधरी सविधं समेति।।३५।।

सर्पवशीकरण
जन्मान्तरेऽपि तव पाद-युगं न देव!
मन्ये मया महितमीहित-दान-दक्षम्।
तेनेह जन्मनि मुनीश! पराभवानां,
जातो निकेतनमहं मथिताशयानाम्।।३६।।

मानसिक कष्ट निवारक
नूनं न मोह-तिमिरावृतलोचनेन,
पूर्वं विभो! सकृदपि प्रविलोकितोऽसि।
मर्माविधो विधुरयन्ति हि मामनर्था:,
प्रोद्यत्प्रबन्ध-गतय: कथमन्यथैते।।३७।।

असह्यकष्ट निवारक
आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीक्षितोऽपि,
नूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या।
जातोऽस्मि तेन जनबान्धव! दु:खपात्रं,
यस्मात्क्रिया: प्रतिफलन्ति न भाव-शून्या:।।३८।।

सर्वज्वरशामक
त्वं नाथ! दु:खि-जन-वत्सल! हे शरण्य!
कारुण्य-पुण्य-वसते! वशिनां वरेण्य।
भक्त्या नते मयि महेश! दयां विधाय,
दुखांकुरोद्दलन-तत्परतां विधेहि।।३९।।

विषमज्वरविघातक
नि:संख्य-सार-शरणं शरणं शरण्य-
मासाद्य सादित-रिपु-प्रथितावदानम्।
त्वत्पाद-पंकजमपि प्रणिधान-वन्ध्यो,
बन्ध्योऽस्मि चेद् भुवन-पावन! हा हतोऽस्मि।।४०।।

अस्त्र-शस्त्र विघातक
देवेन्द्रवन्द्य! विदिताखिल-वस्तु-सार!
संसार-तारक! विभो! भुवनाधिनाथ!।
त्रायस्व देव! करुणा-हृद! मां पुनीहि,
सीदन्तमद्य भयद-व्यसनाम्बु-राशे:।।४१।।

स्त्रीसम्बंधि समस्तरोगशामक
यद्यस्ति नाथ! भवदङ्घ्रि-सरोरुहाणां,
भत्ते: फलं किमपि सन्ततसञ्चिताया:।
तन्मे त्वदेक-शरणस्य शरण्य! भूया:,
स्वामी त्वमेव भुवनेऽत्र भवान्तरेऽपि।।४२।।

बन्धनमोचक एवं वैभववद्र्धक
इत्थं समाहित-धियो विधिवज्जिनेन्द्र!
सान्द्रोल्लसत्पुलक-कञ्चुकिताङ्गभागा:।
त्वद्बिम्ब-निर्मल-मुखाम्बुज-बद्ध-लक्ष्या,
ये संस्तवं तव विभो! रचयन्ति भव्या:।।४३।।

(आर्याछंद)
जननयन ‘कुमुदचन्द्र’! प्रभास्वरा: स्वर्ग-सम्पदो भुक्त्वा।
ते विगलित-मल-निचया, अचिरान्मोक्षं प्रपद्यन्ते।।४४।।


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जैन धर्म के प्रभावशाली स्तोत्र 

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