Dukhharan Vinti-दुःखहरण स्तुति- कविवर वृन्दावनदास जी कृत

Dukhharan Vinti-दुःखहरण स्तुति इसकी रचना का श्रेय कविवर वृन्दावनदास जी कृत

एक अनुपम भक्ति प्रार्थना है। इसमें श्री जिनेन्द्र देव (जैन परमात्मा ) से अपने दुःखों को दूर करने हेतु विनती की गयी है।  अद्भुत शब्दों के संचय से इस की रचना की गयी है। आओ हम भी अपनी विनती उनके श्री चरणों में समर्पित करके अपने दुखों का निदान करे।

Dukhharan Vinti-दुःखहरण स्तुति-

Dukhharan Vinti-दुःखहरण विनती

( रचियता- कविवर वृन्दावनदास जी )

श्रीपति जिनवर करुणायतनं, दुःखहरण तुम्हारा बाना है |
मत मेरी बार अबार करो, मोहि देहु विमल कल्याना है ||

त्रैकालिक वस्तु प्रत्यक्ष लखो, तुमसों कछु बात न छाना है |
मेरे उर आरत जो बरतै, निहचै सब सो तुम जाना है ||
अवलोक विथा मत मौन गहो, नहिं मेरा कहीं ठिकाना है |
हो राज विलोचन सोच विमोचन, मैं तुमसों हित ठाना है ||1|| श्रीपति…

सब ग्रन्थनि में निर्ग्रंथनि ने, निराधार यही गणधार कही |
जिननायक ही सब लायक हैं, सुखदायक छायक ज्ञानमही ||
यह बात हमारे कान परी, तब आन तुम्हारी शरण गही |
क्यों मेरी बार विलम्ब करो, जिननाथ सुनो यह बात सही ||2|| श्रीपति…

काहू को भोग मनोग करो, काहू को स्वर्ग विमाना है |
काहू को नागनरेशपति, काहू को ऋद्धि निधाना है ||
अब मोपर क्यों न कृपा करते, यह क्या अंधेर जमाना है |
इंसाफ करो मत देर करो, सुख वृंद भरो भगवान है ||3||
श्रीपति…

खल कर्म मुझे हैरान किया, तब तुमसों आन पुकारा है |
तुम ही समरत्थ न न्याय करो, तब बंदे का क्या चारा है ||
खल घालक पालक बालक का, नृपनीति यही जग सारा है |
तुम नीति निपुण त्रैलोकपति , तुमही लगि दौर हमारा है ||4|| श्रीपति…

जबसे तुमसे पहचान भई, तबसे तुमही को माना है |
तुमरे ही शासन का स्वामी, हमको शरना सरधाना है ||
जिनको तुमरी शरनागत है, तिनसों यमराज डराना है |
यह सुजस तुम्हारे साचें का, सब गावत वेद पुराना है ||5|| श्रीपति…

जिसने तुमसे दिलदर्द कहा, तिसका तुमने दुख हाना है |
अघ छोटा मोटा नाशि तुरत, सुख दिया तिन्हें मनमाना है ||
पावकसौ शीतल नीर किया, औ चीरबढ़ा असमाना है |
भोजन था जिसके पास नहीं, सो किया कुबेर समाना है ||6|| श्रीपति…

चिंतामणि पारस कल्पतरु, सुखदायक ये सरधाना है |
तब दासन के सब दास यही, हमरे मन में ठहराना है ||
तुम भक्तन को सुर-इंद्र पदी, फिर चक्रपति पद पाना है |
क्या बात कहों विस्तार बढ़ी, वे पावे मुक्ति ठिकाना है ||7||
श्रीपति…

श्री दुःख हरण स्तुति

गति चार चुरासी लाख विषै, चिन्मूरत मेरा भटका है |
हो दीनबन्धु करुणानिधान, अबलों न मिटा वह खटका है ||
जब जोग मिला शिवसाधनका, सग विघन कर्म ने हटका है |
तुम विघन हमारे दूर करो, सुखदेहु निराकुल घटका है ||८|| श्रीपति…

गजग्राह ग्रसित उद्धान लिया, ज्यों अंजन तस्कर तारा है |
ज्यों सागर गोपदरूप किया, मैना का संकट टारा है ||
ज्यों सूली तैं सिंहासन औ बेड़ी को काट विडारा है |
त्यों मेरा संकट दूर करो, प्रभु मोकूं आश तुम्हारा है ||9||
श्रीपति…

ज्यों फाटक टेकत पांय खुला, औ सांप सुमन कर डारा है |
ज्यों खड्ग कुसुम का माल किया, बालक का जहर उतारा है ||
जों सेठ विपत चकचूरि पूर, घर लक्ष्मीसुख विस्तारा है |
त्यों मेरा संकट दूर करो, प्रभु मोकूं आश तुम्हारा है ||10||
श्रीपति…

यद्यपि तुमको रागादि नहीं, यह सत्य सर्वथा जाना है |
चिन्मूरति आप अनंतगुनी, नित शुद्धदशा शिवथाना है।।
तद्यपि भक्तन की भीरि हरो, सुखदेत तिन्हें जू सुहाना है |
यह शक्ति अचिन्त्य तुम्हारी का, क्या पावै पार सयाना है ||11|| श्रीपति…

दुख खंडन श्री सुखमण्डन का, तुमरा प्रण परम प्रमाणा है |
वरदान दया जस कीरत का, तिहुँलोक धुजा फहराना है ||
कमलाधरजी! कमलाकरजी!, करिये कमला अमलाना है |
अब मेरी विथा अवलोकि रमापति, रंच न बार लगाना है ||12।।
श्रीपति…

हो दीनानाथ अनाथ हितू, जन दीन अनाथ पुकारी है |
उदयागत कर्म विपाक हलाहल, मोह विथा विस्तारी है ||
ज्यों आप और भवि जीवन की, ततकाल विथा निरवारी है |
त्यों ‘वृन्दावन’ यह अर्ज करें, प्रभु आज हमारी बारी है ||13||

श्रीपति जिनवर करुणायतनं, दुःखहरण तुम्हारा बाना है |
मत मेरी बार अबार करो, मोहि देहु विमल कल्याना है ||


अन्य श्री जैन स्तोत्र 

Leave a Reply

x
%d bloggers like this: