ATHAI RASA – अठाई रासा -श्री विनयकीर्ति

ATHAI RASA – अठाई रासा-

रचयिता:- कवि श्री विनयकीर्ति

ATHAI RASA - अठाई रासा jain lyrics

‘अठाई’ याने अष्टाह्निका पर्व वर्ष में ३ बार कार्तिक, फाल्गुन व आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष के अंतिम आठ दिनों में मनाये जाते हैं।
इन दिनों में पूजन पाठ तथा सिद्धचक्र विधान करने का महान् फल है।

प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार || टेक |
जम्बूद्वीप सुहावणो, लख-योजन विस्तार ||
भरतक्षेत्र दक्षिण-दिशा, पोदनपुर तहँ सार |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||१||

विद्यापति विद्याधरी, सोमा राणी राय |
समकित पालें मन-वचे, धर्म सुनें अधिकाय |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||२||

चारणमुनि तहाँ पारणे, आये राजा गेह |
सोमाराणी आहार दे, पुण्य बढ़ो अति गेह |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||३||

ताहि समय नभ-देवता, चाले जात विमान |
जय-जय शब्द भयो घनो, मुनिवर पूछ्यो ज्ञान |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||४||

मुनिवर बोले रानि सुन, नंदीश्वर की जात्र |
जे नर करहिं स्वभाव सों, ते पावें शिवकांत |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||५||

ऐसो वच राणी सुन्यो, मन में भयो आनंद |
नंदीश्वर-पूजा करें, ध्यावें आदि जिनंद |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||६||

कार्तिक फागुन साढ़ में, पालें मन-वच-काय |
आठ-दिवस पूजा करें, तीन भवांतर थाय |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||७||

विद्यापति सुन चालियो, रच्यो विमान अनूप |
रानी बरजे राय को, तुम हो मानुष-भूप |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||८||

मानुषोत्तर लंघे नहीं, मानुष जेती जात |
जिनवाणी निश्चय कही, तीन-भुवन विख्यात |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||९||

पर विद्यापति ना सुनि, चल्यो नंदीश्वर-द्वीप |
मानुषोत्र-गिरसों मिलो, जाय विमान महीप |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||१०||

मानुषोत्र की भेंट तें, परो धरनि खिर भार |
विद्यापति-भव चूरियो, देव भयो सुरसार |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||११||

द्वीप-नंदीश्वर छिनक में, पूजा वसु-विध ठान |
करी सु मन-वच-काय से, माल लई कर मान |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||१२||

आनंद सों घर आइयो, नंदीश्वर कर जात्र |
विद्यापति को रूप धर, राणी सों कहे बात |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||१३||

राणी बोली सुन राजा, यह तो कबहुँ न होय |
जिनवाणी मिथ्या नहीं, निश्चय मन में सोय |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||१४||

नंदीश्वर की माल ले, राय दिखाई आय |
अब तू साँचों जान मोहि, पूजन कर बहु भाय |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||१५||

रानी फिर ता सों कहे, नर-भव परसे नाहिं |
पश्चिम सूरज-उदय हुए, जिनवाणी शुचि ताहि |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||१६||

रानी सों नृप फिर कही, बावन-भवन जिनाल |
तेरह-तेरह मैं वंदे, पूजन करि तत्काल |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||१७||

जयमाला तहँ मो मिली, आयो हूँ तुझ पास |
अब तू मिथ्या मान मत, कर मेरो विश्वास |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||१८||

पूरब-दक्षिण में वंदे, पश्चिम-उत्तर जान |
मैं मिथ्या नहिं भाषहूँ, श्रीजिनवर की आन |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||१९||

हे रानी तें सच कही, जिनवानी शुभ-सार |
ढाई द्वीप न लंघई, मानुष-भव विस्तार |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||२०||

विद्यापति तें सुर भयो, रूप धरो शुभ सोय |
रानी की स्तुति करी, निश्चय समकित तोय |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||२१||

देव कह्यो अब रानि सुन, मानुषोत्र मिलो जाय |
तहँ तें चय मैं सुर भयो, पूजे नंदीश्वर पाय |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||२२||

एक भवांतर मो रह्यो, जिनशासन परमान |
मिथ्याती माने नहीं, श्रावक निश्चय आन |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||२३||

सुर-चय नर हथनापुरी, राज कियो भरपूर |
परिग्रह-तजि संयम लियो, कर्म-महागिर चूर |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||२४||

केवलज्ञान उपाय कर, मोक्ष गये मुनिराय |
शाश्वत-सुख विलसे जहाँ, जामन-मरन मिटाय |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||२५||

अब रानी की सुन कथा, संयम लीनो धार |
तपकर चयकर सुर भयी, विलसे सुख विस्तार |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||२६||

गजपुर नगरी अवतरो, राज करे बहु भाय |
सोलहकारण भाइयो, धर्म सुन्यो अधिकाय |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||२७||

मुनि संघाटक आइयो, माली सार जनाय |
राजा वंद्यो भाव सों, पुण्य बढ़्यो अधिकाय |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||२८||

राजा मन वैरागियो, संयम लीनो सार |
आठ सहस नृप साथ ले, यह संसार-असार |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||२९||

केवलज्ञान उपाय के, दोय-सहस निर्वान |
दोय-सहस सुख स्वर्ग के, भोगे भोग सुथान |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||३०||

चार-सहस भूलोक में, हंडे बहु-संसार |
काल पाय शिवपुर गये, उत्तम-धर्म विचार |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||३१||

वरत-अठाई जे करें, तीन जन्म परमान |
लोकालोक सु जान ही, सिद्ध अरथ-कुल खान |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||३२||

भव-समुद्र के तरण को, पावन नौका जान |
जे जिय करें सुभाव सों, जिनवर साँच बखान |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||३३||

मन-वच-काया तें पढ़ें, ते पावें भव पार |
‘विनयकीर्ति’ सुखसों भजे, जन्म सुफल संसार |
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव-पार ||३४||


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