मुनि पुंगव श्री सुधासागर छियालीसा लेखक मुनि श्री उत्तमसागर जी महाराज

मुनि श्री उत्तम सागर जी महाराज द्वारा रचित श्री सुधासागर छियालीसा एक गुरुभक्ति का अद्भुत प्रमाण है।  दोनों ही गुरुवर संत शिरोमणि  आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य है।

सुधासागर छियालीसा

रचियता :मुनि श्री उत्तमसागर जी महाराज

दोहा
वीतराग जिनदेव को सविनय शीश नवाय ।
वीतराग पद प्राप्त हो, वित्त-राग मिट जाय ।।१।।
सर्व-अज्ञ मैं भक्त हूँ, सुधा-सिन्धु मर्मज्ञ
ज्ञान सुधा मुझे दान हो, बनूं शीघ्र सर्वज्ञ ॥२॥

(चौपाई)

परम सुधासागर मुनि जी के । श्री चरणों में है अर्जी ये ।
‘उत्तमसागर’ भर-सुख हम को । देना मुनिवर भव मेटन को ।।१।।

बाल ब्रह्मचारी तुम मुनिवर । वाणी ओजस्वी है हितकर ।
अल्प अरस ही भोजन लेते । बिना चटाई के ही सोते ॥२॥

त्याग तपस्या योग साधना । और आत्म की ध्यान धारना ।
अद्भुत ही है तुमरी मुनिवर ऐसा न कर पाते सब नर ॥३॥

सरस्वती के वरद पुत्र हो । विश्व शान्ति के अमर सूत्र हो ।
विद्या गुरु के परम शिष्य हो । भक्तों के तो आप ईश हो ॥४॥

जादू-टोना कुछ नहिं करते । मंत्र-तंत्र भी तुम ना करते ।
फिर भी ये जनता लाखों में । दौड़ी आती तव चरणों में ॥५॥

क्या सम्मोहन है तुम में ये । कोई इस को जान न पाये ।
होगी तव भव-भव कि साधना । हम सबका है यही मानना ॥६॥

करोड़पति श्रीमान् बिचारे । बड़े-बड़े नेता भी सारे ।
आ जाते हैं पास आपके । हो जाते हैं दास आपके ॥७॥

चाहे कोई पंथवादि हो । चाहे वो निश्चयवादि हो ।
शास्त्र रूप तव लखकर चर्या । छोड़े वे निज मिथ्या किरिया ॥८॥

वाणी मुनिवर की सुनते ही । परिवर्तित होता जीवन ही ।
नजर पड़ेगी तुमरी जिस पर । धन्य धन्य ही होता वो नर ॥९॥

चरण आपके जो छू लेता । उसका तन-मन निरोग होता ।
और आपके गुण जो गाता । वह तो भव सागर तर जाता ॥१०॥

देव-शास्त्र-गुरुवर की भक्ति । देश और तीर्थों की भक्ति ।
मुनिवर तुमरे रोम-रोम में । कूट-कूट कर भरी आप में ॥११॥

बड़े-बड़े नव तीर्थ बनाये । ताम्रपत्र पर ग्रन्थ खुदाये ।
नव-नव गजरथ भी चलवाये । तीर्थों के उद्धार कराये ॥१२॥

और श्रमण संस्कृति रक्षा को । खोला संस्कृत छात्रालय को ।
जैनधर्म की प्रभावना तो । जान लगाकर करते तुम तो॥१३॥

यक्षों से रक्षित प्रतिमायें । जो थी भूगर्भालय में ये ।
इन्हें आप बाहर ले आये । भक्तों को दर्शन करवाये ॥१४॥

भूत-प्रेत या यक्ष-नाग हो । या आवे यमराज पास हो ।
नहीं किसी का भी भय तुम को । वे ही डर जाते लख तुम को ॥१५॥

बड़े-बड़े आचार्य सन्त भी । कर न सके थे ऐसे कार्य भी ।
मुनिवर तुम तो चुटकि बजाते । तप-बल से करके दिखलाते ॥१६॥

कार्य आपके लखकर के ही । सुर-नर मुनि जन अरु गुरुवर भी।
दाँतों तले, दबाते ऊँगली । ऐसी अनुपम किरिया तुमरी ॥१७॥

दिल से, मन से और शकल से । सदा साफ हो तुम अंदर से।
मानो अंतर शुचि बतलाने । श्वेत बाल तव हुये सुहाने ॥१८॥

आध्यात्मिक मुनि तुम कवि भी हो। महादार्शनिक तार्किक भी हो।
वचन सिद्धि है तुम को मुनिवर । जो कहते वह होता हर पल ॥१९॥

ज्यों सुगंध से खिले कमल को । देख भ्रमर खुद गाते गुण को ।
इसी तरह से ही मुनिवर तुम । सुगुण गंध से महके हर दम ॥२०॥

तुमरे गुण ही हम भक्तों को । करते हैं वाचाल स्तवन को ।
मुझे प्राप्त हो सुगुण आपके । गाता मैं गुण अतः आपके ॥२१॥

जब जब भी मैं तव गुण गाता । कंठ हर्ष से तब भर आता ।
जब तव गुण का चिन्तन करता । भान समय का तब ना रहता ॥२२॥

सुधा-सिन्धु है जगत हितंकर । अतः सभी हम जिनवर के दर ।
करें प्रार्थना हम ये मुनिवर । बनें शीघ्र ही अब तीर्थंकर ॥२३॥

॥ मुनि पुंगव श्री सुधासागर छियालीसा सम्पूर्णम ॥


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